“छात्र प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट” का बड़ा फैसला: पुलिस ज्यादती की जांच
छात्र प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट नीट (NEET) परीक्षा धांधली और पेपर लीक विवाद के दौरान दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में हुए छात्र आंदोलनों को लेकर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने कड़ा रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मंगलवार को घोषणा की कि वे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की अत्यधिक बल प्रयोग (Police Excesses), हिंसा, महिला प्रदर्शनकारियों के यौन उत्पीड़न और ऑनलाइन ट्रोलिंग के दावों की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति (High-Powered Committee) का गठन करेंगे।
इस प्रस्तावित समिति में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और पूर्व पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी शामिल होंगे।
तथ्यात्मक जांच करेगी कमेटी, अनुच्छेद 142 के तहत FIR होंगी रद्द
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि तीन सदस्यीय यह पैनल केवल तथ्यों का पता लगाने (Fact-Finding) का काम करेगा।
अनुच्छेद 142 का प्रयोग: सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से दर्ज प्राथमिकियों (FIRs) का ब्योरा मांगते हुए पीठ ने संकेत दिया कि वह निर्दोष छात्रों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर दर्ज केस रद्द कर सकती है।
छात्रों के अधिकारों की रक्षा: CJI सूर्य कांत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यह छात्रों की जिंदगी और उनके भविष्य का सवाल है। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार है।” हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि यह राहत गंभीर और जघन्य आपराधिक इतिहास वाले असामाजिक तत्वों पर लागू नहीं होगी।
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फेस रिकग्निशन और प्राइवेसी पर संवैधानिक फैसला खुद करेगा सुप्रीम कोर्ट
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों (मेनका गुरुस्वामी, वृंदा ग्रोवर, और एन. हरिहरन) ने पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT), डिजिटल ट्रैकिंग और गोपनीयता (Privacy) के उल्लंघन पर सवाल उठाए।
अदालत का रुख: बेंच ने साफ किया कि निगरानी और अनुच्छेद 21 से जुड़े बड़े संवैधानिक मुद्दों पर अंतिम फैसला खुद सुप्रीम कोर्ट करेगा, जबकि कमेटी केवल यह जांचेगी कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल किया गया बल अत्यधिक था या नहीं।
सॉलीसिटर जनरल का स्पष्टीकरण: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि पुलिस हर नागरिक का चेहरा स्कैन नहीं कर रही है, बल्कि केवल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के डेटाबेस में दर्ज गंभीर अपराधियों का मिलान कर रही है।
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20 जुलाई के संसद मार्च का मामला
यह पूरी कानूनी कार्यवाही 20 जून से शुरू हुए छात्र आंदोलनों से जुड़ी है, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में 20 जुलाई को दिल्ली में संसद मार्च निकाला गया था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुई थीं और पुलिस ने लाठीचार्ज व आंसू गैस के गोलों का प्रयोग किया था।
अदालत ने निर्देश दिया है कि 20 जुलाई की घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज और वीडियो साक्ष्य जांच के लिए गठित समिति को सौंपे जाएं।
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सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से विरोध प्रदर्शन करने वाले हजारों निर्दोष छात्रों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। जहां एक ओर अदालत छात्रों के करियर की रक्षा के लिए एफआईआर रद्द करने की दिशा में बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस बल प्रयोग की सीमाओं और तकनीकी निगरानी के संवैधानिक दायरा भी तय होने जा रहा है। देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों और शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणियों के बीच गरमाया छात्र प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट मामला
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