“भारत ईरान व्यापार असर” अमेरिकी प्रतिबंधों से भारतीय चावल पर संकट
भारत ईरान व्यापार असर अमेरिकी प्रशासन की ओर से ईरान के खिलाफ घोषित नए और कड़े प्रतिबंधों का सीधा असर भारत के कृषि और निर्यात क्षेत्र पर पड़ता दिख रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ (Operation Economic Outcast) और खाड़ी देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा तेहरान के साथ वित्तीय व कमर्शियल संबंधों को निलंबित करने के बाद, भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स के सामने गहरा आर्थिक संकट पैदा हो गया है।
ईरान भारतीय बासमती और प्रीमियम चावल के लिए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातकीय बाजार है। ऐसे में व्यापारिक और बैंकिंग चैनलों के बंद होने से उत्तर भारत के मिलर्स और निर्यातकों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
UAE ट्रेड कॉरिडोर बंद होने से बिगड़ा बैंकिंग और पेमेंट सिस्टम
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) लंबे समय से ईरान के साथ व्यापार करने का मुख्य जरिया और पेमेंट रूट रहा है।
पारंपरिक व्यवस्था: भारतीय कारोबारी UAE के व्यापारियों के जरिए बैंकिंग माध्यमों (दिरहम या डॉलर) में अपना भुगतान प्राप्त करते थे, जो बाद में कानूनी तरीकों से ईरानी ग्राहकों से निपटाना करते थे।
मौजूदा संकट: UAE द्वारा ईरान के साथ सभी वित्तीय और व्यावसायिक लेनदेन रोकने से पेमेंट सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है।
नया विकल्प: इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के उपाध्यक्ष देव गर्ग के अनुसार, इस कॉरिडोर में रुकावट का सबसे ज्यादा असर नॉन-बासमती की तुलना में बासमती इंडस्ट्री पर पड़ेगा। अब निर्यातक तुर्की जैसे अन्य देशों के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का रुख करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे माल ढुलाई (Freight) और लॉजिस्टिक्स की लागत काफी बढ़ सकती है।
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चावल और चाय निर्यात के आंकड़ों पर एक नजर
2026 की पहली छमाही के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि ईरान का बाजार भारतीय कृषि निर्यात के लिए कितना महत्वपूर्ण है:
| निर्यात वस्तु (Export Item) | 2026 की पहली छमाही का आंकड़ा | प्रमुख प्रभावित क्षेत्र |
| प्रीमियम / बासमती चावल | $383.11 मिलियन (लगभग ₹400 मिलियन) | पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी के राइस मिलर्स |
| भारतीय चाय (Tea Export) | $14.34 मिलियन | असम और पश्चिम बंगाल के चाय बागान मालिक |
चाय बोर्ड के पूर्व चेयरमैन प्रभात बेज़बरुआ के अनुसार, चूंकि ईरान को चाय का अधिकांश शिपमेंट UAE के जरिए ही होता था, इसलिए नए प्रतिबंधों से चाय के पेमेंट और लॉजिस्टिक्स पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
चीन बनाम भारत: अमेरिकी प्रतिबंधों पर दो अलग रवैये
भू-रणनीतिकार (Geostrategist) ब्रह्मा चेलाने के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए इस आर्थिक नाकेबंदी (Economic D-Day) की सफलता काफी हद तक चीन पर निर्भर करती है।
चीन का रुख (China’s Stand)
चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2025 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 9.96 बिलियन डॉलर था (जिसमें 31.2 बिलियन डॉलर का अघोषित कच्चा तेल शामिल नहीं है)।
चीन ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90% हिस्सा खरीदता है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने स्पष्ट किया है कि बीजिंग अमेरिकी प्रतिबंधों के आगे नहीं झुकेगा और अपने राष्ट्रीय व व्यापारिक हितों की रक्षा करेगा।
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भारत की स्थिति (India’s Position)
इसके विपरीत, भारत ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंधों का पालन करता रहा है। भारत ने 2019 में ईरानी कच्चे तेल का आयात पूरी तरह बंद कर दिया था।
यद्यपि अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 के बीच भारत-ईरान व्यापार 1.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, लेकिन नए प्रतिबंधों के चलते भारत के वाणिज्यिक संबंधों पर एक बार फिर ब्रेक लग सकता है।
भारतीय कंपनियों पर गिरा अमेरिकी प्रतिबंधों का चाबुक
‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ के तहत अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरान से पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के आयात में मदद करने के आरोप में भारत स्थित चार संस्थाओं और कारोबारियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं:
Portease Partners LLP (कस्टम्स ब्रोकर) और इसके पार्टनर्स (इन्द्रिसमिया अशरफमिया शेख एवं हरीश रामचंद्र रंगी)।
सदाशिव ओवरसीज लिमिटेड (Sadashiv Overseas Limited)।
पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड (PP Softtech Pvt Ltd) और इसके डायरेक्टर प्रशांत गर्ग।
प्रकृतिस इंफ्रा इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड (Prakritis Infra Impex Pvt Ltd)।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग का कहना है कि इन कंपनियों ने ईरानी पेट्रोकेमिकल खेप की आवाजाही में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। हालांकि, भारत सरकार की ओर से अभी इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
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भारतीय निर्यातकों के सामने आगे की राह
2018-19 में भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 17 अरब डॉलर के अपने उच्चतम स्तर (Peak) पर था, जो अब घटकर 90% से अधिक कम हो चुका है। वर्तमान में व्यापार केवल उन्हीं वस्तुओं तक सीमित रह गया था जिन्हें मानवीय आधार पर छूट प्राप्त थी।
लेकिन UAE के रास्ते बैंकिंग चैनल बंद होने से भारतीय चावल और चाय निर्यातकों के सामने भुगतान फंसने का गंभीर जोखिम खड़ा हो गया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत सरकार अपने कृषि निर्यातकों को इस संकट से उबारने के लिए क्या वैकल्पिक उपाय निकालती है। चाबहार पोर्ट के विकास और द्विपक्षीय समझौतों के बीच जानें भारत ईरान व्यापार असर की पूरी इनसाइड स्टोरी वैश्विक प्रतिबंधों और आर्थिक चुनौतियों के बीच गहराता जा रहा है भारत ईरान व्यापार असर
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