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“टीएमसी बागी सांसद” अभिषेक बनर्जी की याचिका पर 25 अगस्त को सुनवाई

टीएमसी बागी सांसद

“टीएमसी बागी सांसद” तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उसकी पार्टी से बगावत करने वाले 20 सांसदों के बीच का राजनीतिक और कानूनी विवाद अब देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष याचिका दायर की है। इस याचिका में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला द्वारा बागी सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में हो रही कथित देरी को चुनौती दी गई है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को होगी।

25 अगस्त को तीन जजों की बेंच करेगी मामले की सुनवाई

शीर्ष अदालत में इस महत्वपूर्ण संवैधानिक याचिका पर सुनवाई के लिए तीन जजों की विशेष पीठ (Bench) का गठन किया गया है।

बेंच के सदस्य: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।

प्रमुख कानूनी सवाल: याचिका में इस बात पर विचार करने का आग्रह किया गया है कि क्या न्यायपालिका (Supreme Court) दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत लोकसभा अध्यक्ष को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दे सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में महाराष्ट्र के शिवसेना अयोग्यता प्रकरण में दिए गए तर्कों की तर्ज पर ही विचार-विमर्श होने की संभावना है।

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क्या है 20 बागी सांसदों और NCPI विलय का पूरा विवाद?

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरण उस समय बदल गए जब टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से बगावत कर दी और खुद को नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जोड़ने का फैसला किया। यह दल केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करता है।

घटनाक्रम का पूरा ब्योरा:

14 जून: टीएमसी के 19 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक लिखित आवेदन सौंपकर NCPI के साथ अपने संसदीय गुट के विलय को मान्यता देने की मांग की।

15 जून: सांसद रचना बनर्जी ने भी अलग से पत्र सौंपकर इसी तरह के विलय की मांग दोहराई।

अभिषेक बनर्जी की कार्रवाई: टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का हवाला देते हुए इन 20 सांसदों की सदस्यता रद्द करने के लिए स्पीकर के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं दायर कीं।

बैठकें और रिमाइंडर: 27 जुलाई को लिखित रिमाइंडर भेजने के बाद अभिषेक बनर्जी ने 12 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर जल्द फैसले का आग्रह किया था।

    टीएमसी का पक्ष: ‘चुने हुए जनादेश का अपमान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला’

    सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में टीएमसी ने तर्क दिया है कि बागी सांसदों ने तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम पर जनता से वोट प्राप्त किया था।

    पार्टी का कहना है:

    “स्वेच्छा से किसी अन्य राजनीतिक दल या गठबंधन (NDA) की गतिविधियों में शामिल होना पार्टी की सदस्यता छोड़ने जैसा ही है। जब तक स्पीकर अयोग्यता पर फैसला नहीं लेते, तब तक सदन की वास्तविक संख्या प्रणाली प्रभावित होती है, जो कि लोकतंत्र और जनता के स्पष्ट जनादेश का सीधा उल्लंघन है।”

    वर्तमान में ये बागी सांसद संसद भवन में NCPI समूह के रूप में दिखाई देते हैं और एनडीए की विधायी बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं, जबकि टीएमसी का दावा है कि उनका यह दर्जा कानूनी रूप से अमान्य है।

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    पश्चिम बंगाल की राजनीति पर गहरा असर: विधानसभा में भी बगावत

    यह विवाद केवल संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी के सामने इसी तरह का संकट बना हुआ है।

    विधानसभा का समीकरण: पश्चिम बंगाल विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 62 विधायकों का एक बड़ा गुट टीएमसी से अलग हो चुका है।

    स्टेटस का इंतजार: विधानसभा और लोकसभा दोनों ही जगहों पर बागी नेताओं को अपने आधिकारिक राजनीतिक दर्जे (Official Status) पर अंतिम निर्णय का इंतजार है।

    शिवसेना (UBT) मामले का संदर्भ: चुनाव आयोग और संबंधित प्राधिकारी इस बात का भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या त्रिपुरा-आधारित NCPI के साथ विलय की प्रक्रिया और असली-नकली टीएमसी का दावा सुप्रीम कोर्ट में लंबित उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे (शिवसेना मामला) के फैसले से प्रभावित होता है या नहीं।

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    शीर्ष अदालत के फैसले पर टिकी देश की निगाहें

    तृणमूल कांग्रेस बनाम बागी सांसद का यह मामला भारतीय संसदीय प्रणाली में स्पीकर के विशेषाधिकार और अयोग्यता मामलों की समय-सीमा पर एक नया नजीर पेश कर सकता है।

    25 अगस्त को होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो पाएगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को एक निश्चित समय के भीतर अयोग्यता याचिका पर निर्णय लेने का आदेश जारी करेगा या नहीं। पार्टी आलाकमान की कार्रवाई और दलबदल की चर्चाओं के बीच गरमाया टीएमसी बागी सांसद मामला

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