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मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में अज्ञात बीमारी का कहर, आठ बच्चों की मौत,

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बालाघाट बीमारी बच्चों मौत मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के अत्यंत दूर-दराज और बैगा आदिवासी बहुल गांवों से स्वास्थ्य सुविधाओं और बुनियादी ढांचे से जुड़ी एक गंभीर खबर सामने आ रही है। पिछले छह हफ़्तों में अज्ञात संक्रामक बीमारियों, मलेरिया जैसे लक्षणों और गंभीर त्वचा संक्रमण के कारण 1 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों की मौत दर्ज की गई है।

इसके अतिरिक्त, 100 से अधिक बच्चे और किशोर इस अज्ञात बीमारी की चपेट में आकर बीमार हैं, जिनका इलाज बालाघाट जिला अस्पताल और स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चल रहा है।

स्वास्थ्य विभाग की टीमों को इन मौतों की भनक तब लगी जब शुरुआती कुछ मौतें पहले ही हो चुकी थीं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रभावित इलाकों में पुलिस और प्रशासनिक टीमों की मदद से बच्चों को चिन्हित कर अस्पताल पहुंचाया जा रहा है।

प्रभावित गांव और स्वास्थ्य संकट का दायरा

बालाघाट के मुख्य रूप से बैगा आदिवासी बहुल बस्तियों में यह स्वास्थ्य संकट देखा जा रहा है। बैगा समुदाय मध्य प्रदेश के तीन विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में से एक है।

प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: कोरका, कुंडेकासा, बोंडारी, मछुरदा और अडोरी जैसे गांवों में लगातार संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं।

अस्थायी हेल्थ सेंटर: कुंडेकासा गांव सबसे ज्यादा प्रभावित होने के कारण प्रशासन को वहां के एक स्थानीय शासकीय स्कूल को ही अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र (Temporary Health Center) में तब्दील करना पड़ा है।

अस्पताल में भर्ती मरीज़: बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. परेश उपलाप के अनुसार, जिला अस्पताल में 3 से 17 साल की उम्र के लगभग 98 मरीजों को लाया गया था। इनमें से सफल इलाज के बाद 51 मरीजों को छुट्टी दे दी गई है, जबकि 47 बच्चों की स्थिति पर डॉक्टरों की टीम चौबीसों घंटे निगरानी बनाए हुए है।

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रोग के लक्षण और एडवांस्ड लैब में भेजे गए सैंपल

बीमार पड़ रहे बच्चों का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि मरीजों में एक साथ कई तरह के संक्रमण के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।

प्रमुख लक्षण: बच्चों में तेज बुखार, त्वचा पर लाल चकत्ते (रैशेज), पेट में तेज दर्द, डिहाइड्रेशन, अल्सर, मलेरिया बुखार और संक्रामक खुजली (स्कैबीज) के लक्षण शामिल हैं।

लैब टेस्टिंग: बीमारी के वास्तविक कारणों का सटीक पता लगाने के लिए मरीजों के रक्त और जल के नमूने (Samples) देश के प्रमुख शोध संस्थानों को भेजे गए हैं। इनमें कोलकाता स्थित इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) संस्थान और पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) शामिल हैं।

विशेषज्ञ टीमों का दौरा: ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्राइबल हेल्थ रिसर्च (NITHR), इंटीग्रेटेड डिसीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP भोपाल) और जबलपुर मेडिकल कॉलेज की विशेषज्ञ टीमों ने प्रभावित गांवों का दौरा कर सैंपल एकत्र किए हैं।

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इलाज में देरी और पारंपरिक प्रथाएं बनीं चुनौती

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस संकट के बढ़ने का एक बड़ा कारण स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने में हुई देरी है। अत्यंत दूरस्थ इलाकों में रहने वाले बैगा समुदाय के लोग आधुनिक चिकित्सा उपचार के बजाय शुरुआती चरणों में पारंपरिक वैद्य, झाड़-फूंक और आस्था-आधारित अनुष्ठानों पर निर्भर रहे।

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि यदि मरीजों को शुरुआती लक्षणों के तुरंत बाद अस्पताल लाया गया होता, तो मौतों के इस आंकड़े को रोका जा सकता था। कई स्थानों पर डॉक्टरों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को परिवारों को अस्पताल जाने के लिए तैयार करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी और पुलिस बल का सहयोग लेना पड़ा।

संरचनात्मक समस्याएं और कुपोषण का पहलू

हालांकि, स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस पूरे मामले को केवल अंधविश्वास या पारंपरिक मान्यताओं का नतीजा मान लेना सही नहीं होगा।

दूरी और परिवहन की कमी: प्रभावित गांवों से नजदीकी सरकारी अस्पताल 20 से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, जहां तक पहुंचने के लिए परिवहन के साधन सुलभ नहीं हैं।

कुपोषण की समस्या: आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बच्चों में कुपोषण की दर काफी अधिक है, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बेहद कमजोर हो जाती है। इसके चलते वे सामान्य से सामान्य संक्रामक बीमारियों की चपेट में भी आसानी से आ जाते हैं।

देरी से रेफरल: परिजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल से अन्य बड़े शहरों के निजी या उच्च स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को रेफर किए जाने के दौरान भी कीमती समय नष्ट होता है।

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    प्रशासनिक कदम और मौजूदा स्थिति

    स्थिति पर काबू पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में सर्वे और स्क्रीनिंग का काम तेज कर दिया है:

    क्षेत्र में घर-घर जाकर जांच करने के लिए 20 सर्वे टीमें, 10 मेडिकल ऑफिसर और 4 एम्बुलेंस तैनात की गई हैं।

    गांवों में पीने के पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था दुरुस्त की जा रही है।

    जिला प्रशासन का दावा है कि स्थिति अब नियंत्रण में है और एडवांस्ड प्रयोगशालाओं से रिपोर्ट आने के बाद बीमारी के मूल कारणों के आधार पर लक्षित उपचार और बचाव की रणनीति अपनाई जाएगी। स्वास्थ्य विभाग के अलर्ट और जिला प्रशासन की टीमों के बीच गरमाया बालाघाट बीमारी बच्चों मौत मामला अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती और जांच रिपोर्ट के बीच जानें बालाघाट बीमारी बच्चों मौत की पूरी सच्चाई बालाघाट बीमारी बच्चों मौत, स्वास्थ्य सुविधाओं में कमियों और संक्रमण के कारणों पर बालाघाट बीमारी बच्चों मौत का विश्लेषण

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