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बंधुआ मजदूरी: हिसार दीवार ढहने पर आयोग सख्त, 4 बच्चों की मौत

बंधुआ मजदूरी

हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने हिसार में एक दुखद घटना पर कड़ी कार्रवाई शुरू की है। पिछले साल दिसंबर में बुडाना गांव के ईंट भट्ठे पर दीवार ढहने से चार बच्चों की मौत हुई थी। आयोग ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए अक्टूबर तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यह घटना प्रवासी मजदूरों की दयनीय स्थिति और संभावित बंधुआ मजदूरी की ओर इशारा करती है।

घटना की भयावहता और आयोग की प्रतिक्रिया

22 दिसंबर, 2024 की रात बुडाना गांव में भट्ठे की दीवार अचानक ढह गई। दीवार के पास सो रहे चार बच्चों की मौके पर ही मौत हो गई। तीन अन्य बच्चे गंभीर रूप से घायल हुए। पीड़ितों के परिवार उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी मजदूर थे। वे भट्ठे पर ही असुरक्षित झुग्गियों में रह रहे थे।

आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ललित बत्रा की अगुवाई वाली पीठ ने इस घटना को गंभीरता से लिया। पीठ ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। साथ ही, प्रशासनिक लापरवाही की ओर भी इशारा किया।

बंधुआ मजदूरी के स्पष्ट संकेत

आयोग ने प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए। मजदूरों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी जा रही थीं। उनके रहने की जगह अत्यंत खतरनाक थी। काम करने की स्थितियाँ भी बहुत खराब थीं। आयोग को लगता है कि यहाँ बंधुआ मजदूरी जैसी प्रथा हो सकती है।

यह प्रथा बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है। मजदूरों के पास शायद कोई विकल्प नहीं था। वे मजबूरी में इन भयानक हालातों में रहने और काम करने को मजबूर थे।

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भट्ठा मालिक की जिम्मेदारी और कानूनी कर्तव्य

ईंट भट्ठे के मालिक पर आयोग ने सीधे उंगली उठाई है। आयोग के अनुसार, मालिक का स्पष्ट नैतिक और कानूनी दायित्व था। उसे मजदूरों और उनके परिवारों को सुरक्षित आवास देना चाहिए था। साफ पीने का पानी और स्वच्छता सुविधाएँ भी मुहैया करानी चाहिए थीं। कार्यस्थल पर सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना जरूरी था।

इन बुनियादी जरूरतों की अनदेखी ने इस त्रासदी को जन्म दिया। आयोग ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन माना है। यह अनुच्छेद जीवन के अधिकार की गारंटी देता है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन का भी उल्लंघन हुआ है।

आयोग के आदेश और जांच के निर्देश

24 जुलाई के अपने आदेश में आयोग ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। संबंधित अधिकारियों को आठ सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी। जिला उपायुक्त यह पता लगाएंगे कि पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिला या नहीं। सहायक श्रम आयुक्त को एक गहन जाँच करनी है। उसे यह पता लगाना है कि क्या भट्ठे पर बंधुआ मजदूरी चल रही थी।

अगर ऐसा पाया गया, तो तुरंत कानूनी कार्रवाई शुरू करनी होगी। भट्ठा मालिक को भी जवाब देना होगा। उसे सुरक्षा और रहने की व्यवस्था न करने का कारण बताना होगा। अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को होगी।

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भारत के ईंट भट्ठे: गुलाम मजदूरी का अड्डा?

हिसार की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। भारत के हजारों ईंट भट्ठों पर हालात बहुत खराब हैं। अक्सर गरीब प्रवासी मजदूर, खासकर दलित और आदिवासी समुदाय के लोग, इन पर निर्भर होते हैं। कर्ज के जाल में फंसकर वे बंधुआ मजदूरी के शिकार बन जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, हर साल बंधुआ मजदूरी के हजारों मामले दर्ज होते हैं।

पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। गैर-सरकारी संगठनों का मानना है कि लाखों लोग अभी भी इस अमानवीय प्रथा का शिकार हैं। कई बार पूरा परिवार, बच्चों समेत, काम करने को मजबूर होता है। बच्चों की शिक्षा और बचपन छिन जाता है।

कानूनी ढांचा और चुनौतियाँ

भारत में बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने के लिए मजबूत कानून हैं। बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 इसका मुख्य कानून है। केंद्र और राज्य सरकारों ने पुनर्वास योजनाएँ भी बनाई हैं। पर अमल में कमी बड़ी समस्या है। श्रम विभागों में कर्मचारियों की भारी कमी है। संसाधनों का अभाव भी एक बड़ी बाधा है।

भट्ठा मालिक अक्सर स्थानीय प्रशासन और पुलिस से मिले हुए होते हैं। इससे शोषण का चक्र बिना रुके चलता रहता है। मजदूरों को अक्सर अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं होती। डर और गरीबी के कारण वे शिकायत करने से कतराते हैं।

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आगे का रास्ता और सामूहिक जिम्मेदारी

हिसार त्रासदी एक कड़ी चेतावनी है। इससे साफ पता चलता है कि मजदूर सुरक्षा को गंभीरता से लेना कितना जरूरी है। केवल कानून बनाना ही काफी नहीं है। उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। श्रमिकों के काम करने की परिस्थितियों की नियमित जांच होनी चाहिए।

बंधुआ मजदूरी के शिकार लोगों को तुरंत छुड़ाना चाहिए। उन्हें मुआवजा और पुनर्वास दिया जाना चाहिए। भट्ठा मालिकों को भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्हें मजदूरों के साथ इंसानियत का व्यवहार करना होगा। सुरक्षित माहौल और बुनियादी सुविधाएं देना उनकी जिम्मेदारी है।

सरकार, प्रशासन, नागरिक समाज और मीडिया को मिलकर काम करना होगा। तभी ऐसी भयानक घटनाओं को रोका जा सकता है। तभी हर मजदूर को गरिमा और सुरक्षा के साथ जीने का अधिकार मिल सकेगा। आयोग की यह पहल एक सकारात्मक कदम है।

इससे उम्मीद है कि पीड़ित परिवारों को न्याय मिलेगा। साथ ही, भट्ठों पर काम करने वाले अन्य मजदूरों की स्थिति में भी सुधार आएगा।

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