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दिल्ली हाई कोर्ट पुलिस नोटिस पुलिस को CCTV फुटेज सुरक्षित रखनेकाआदेश,

दिल्ली हाई कोर्ट पुलिस

दिल्ली हाई कोर्ट पुलिस नोटिस नीट (NEET-UG) परीक्षा में कथित अनियमितताओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हुई पुलिसिया बर्बरता का मामला अब न्यायपालिका के गलियारों में गरमा गया है।

बुधवार, 22 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने घटना पर गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही अदालत ने 20 और 21 जुलाई के सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, वीडियोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के सख्त निर्देश दिए हैं।

दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्रों पर हुए हमले की वीडियो देखने से कथित तौर पर इनकार करने पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) [CPI(M)] ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सार्वजनिक टिप्पणियों पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है।

दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त आदेश: “यह कोई अकेली घटना नहीं, अधिकारियों को देना होगा जवाब”

दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों और कार्यकर्ताओं पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज, आंसू गैस और इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल के खिलाफ दायर दो जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई की।

केंद्र व दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने तर्क दिया कि प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए थे, पत्थरबाजी की थी और धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144) का उल्लंघन किया था। ASG ने कहा कि घायलों को हाईकोर्ट आने के बजाय एफआईआर (FIR) दर्ज कराने के लिए पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए।

हालांकि, हाई कोर्ट की पीठ ने सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने कहा:

“अगर यह कोई अकेली घटना होती, तो व्यक्तिगत शिकायत दर्ज कराने की बात सही हो सकती थी। लेकिन यह ऐसी अकेली घटना नहीं है। व्यापक स्तर पर पुलिसिया बल प्रयोग के आरोपों पर अधिकारियों को अदालत में अपना औपचारिक रुख स्पष्ट करना ही होगा।”

हाई कोर्ट ने केंद्र व दिल्ली पुलिस को चार हफ्ते में जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 तय की है।

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याचिकाकर्ताओं के गंभीर आरोप: बिना चेतावनी लाठीचार्ज, महिला प्रदर्शनकारियों से दुर्व्यवहार

वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए आरोप लगाया कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे छात्रों पर बिना किसी पूर्व चेतावनी या उद्घोषण के बर्बर लाठीचार्ज किया गया।

याचिका में दावा किया गया कि:

पुलिस कार्रवाई में 90 से अधिक छात्र और युवा गंभीर रूप से घायल हुए।

सादे कपड़ों और बिना नेम-टैग वाली वर्दी में आए पुलिसकर्मियों ने निहत्थे छात्रों को निशाना बनाया।

महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसकर्मियों ने अभद्रता और दुर्व्यवहार किया।

याचिकाकर्ताओं ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर, विशेष जांच दल (SIT) के गठन और बॉडी-कैमरा फुटेज की जब्ती की मांग की है।

CJI की टिप्पणियों पर CPI(M) का हमला; न्यायपालिका में भरोसा घटने की चेतावनी

संसद मार्ग पर हुए घटनाक्रम की गूँज शीर्ष अदालत और राजनीतिक दलों तक भी पहुँच गई है। सीपीआई (एम) के आंध्र प्रदेश राज्य सचिव वी. श्रीनिवास राव ने बुधवार को एक बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा सुनवाई के दौरान की गई कथित टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताया।

रिपोर्टों के अनुसार, शीर्ष अदालत ने छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के वीडियो देखने से इनकार करते हुए कहा था कि ‘अदालत के पास इसकी जांच का समय नहीं है।’ इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सीपीआई (एम) नेता ने कहा:

“उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को सार्वजनिक रूप से बोलते समय संयम और जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। अदालत द्वारा पुलिस कार्रवाई का वीडियो देखने से इनकार करने और समय की कमी का हवाला देने जैसी टिप्पणियों से न्यायपालिका में आम जनता का भरोसा कमजोर होता है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में तुरंत स्वतंत्र जांच का आदेश देना चाहिए।”

इसके साथ ही, सीपीआई (एम) ने आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में कांग्रेस कार्यालय (APCC) के बाहर भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए हिंसक विरोध-प्रदर्शन, हैदराबाद और पटना की झड़पों की भी कड़े शब्दों में निंदा की और राजनीतिक विरोधियों के दफ्तरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

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सोनम वांगचुक को हटाने से जुड़ी PIL खारिज

एक अन्य न्यायिक घटनाक्रम में, दिल्ली हाई कोर्ट ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से जबरन हटाए जाने की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।

पीठ ने स्पष्ट किया कि वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो द्वारा पहले ही इस संबंध में याचिका दायर की जा चुकी है, इसलिए एक ही घटना पर दूसरी समानांतर याचिका पोषणीय नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को बीएनएसएस (BNSS) के तहत अन्य कानूनी मंचों पर जाने की छूट दी।

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संपादकीय दृष्टिकोण:

लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा 20 और 21 जुलाई के सभी इलेक्ट्रॉनिक और सीसीटीवी साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश एक स्वागतयोग्य कदम है, जो भविष्य की जांच में निष्पक्षता सुनिश्चित करेगा।

वहीं, चाहे न्यायपालिका हो या कार्यपालिका, देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्रों के आंदोलनों से निपटते समय संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अनिवार्य होना चाहिए।

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