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खाद्य असुरक्षा 2024-25: बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान संकटग्रस्त

खाद्य असुरक्षा 2024-25

2024 में वैश्विक खाद्य असुरक्षा ने भयावह रूप धारण किया। एफएओ की नई रिपोर्ट चौंकाने वाले आँकड़े प्रस्तुत करती है। विश्व भर में 29.53 करोड़ लोग तीव्र भूख का सामना कर रहे हैं। यह संख्या पिछले वर्ष से 1.37 करोड़ अधिक है। स्थिति लगातार पाँचवें वर्ष गंभीर बनी हुई है। वैश्विक खाद्य संकट अब एक स्थायी समस्या बन गया है।

खाद्य असुरक्षा के मुख्य कारण

संघर्ष इस समस्या का प्राथमिक कारण बना हुआ है। गाजा, सूडान जैसे क्षेत्रों में 14 करोड़ लोग प्रभावित हैं। इसके अतिरिक्त, आर्थिक संकटों ने भी हालात बिगाड़े हैं। मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन ने अफ़ग़ानिस्तान, यमन को विशेष रूप से घेरा है। लगभग 5.94 करोड़ लोग आर्थिक झटकों से पीड़ित हैं। विश्व बैंक के अनुसार, 33 देशों में महंगाई दर 20% से ऊपर है। यह खाद्य पहुँच को सीमित कर रहा है।

जलवायु आपदाओं का प्रभाव

चरम मौसमी घटनाएँ खाद्य असुरक्षा बढ़ाने में प्रमुख हैं। दक्षिणी अफ्रीका, एशिया और हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। विश्व स्तर पर 9.6 करोड़ लोगों पर मौसम की मार पड़ी। इन क्षेत्रों में फसलों का भारी नुकसान हुआ। परिणामस्वरूप, कुपोषण के मामले तेजी से बढ़े हैं। आईपीसी रिपोर्ट बताती है कि सोमालिया में 43% बच्चे अविकसित हैं। यह स्थिति भविष्य के लिए चिंताजनक है।

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शीर्ष 10 देशों की स्थिति

तीव्र खाद्य असुरक्षा वाले देशों की सूची 2023 जैसी ही है। इन दस देशों में 19.6 करोड़ से अधिक प्रभावित हैं। यह वैश्विक संख्या का 66% है। नाइजीरिया, सूडान और कांगो अकेले 28% हिस्सेदारी रखते हैं। अफ़ग़ानिस्तान, यमन जैसे देश लगातार नौ सालों से इस सूची में हैं। विशेष रूप से बांग्लादेश में स्थिति चिंताजनक है। वहाँ 23.6 करोड़ लोग संकटग्रस्त हैं।

तालिका: सर्वाधिक प्रभावित देश

रैंक देश प्रभावित आबादी (करोड़)
1 नाइजीरिया 3.18
2 सूडान 2.56
3 कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य 2.56
4 बांग्लादेश 2.36
5 इथियोपिया 2.20
6 यमन 1.67
7 अफ़ग़ानिस्तान 1.58
8 म्यांमार 1.44
9 पाकिस्तान 1.18
10 सीरिया 0.92

स्रोत: आईपीसी टीडब्ल्यूजी, 2024; एचएनआरपी के तहत किया गया म्यांमार पूर्व-विश्लेषण; सीएच, 2024; फ्यूजनेट (इथियोपिया); डब्ल्यूएफपी (सीएआरआई).

नए संकट: जलवायु परिवर्तन की भूमिका

वैश्विक तापमान वृद्धि ने खाद्य उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है। विश्व बैंक के अनुसार, 2024 में दक्षिण एशिया में चावल उत्पादन 15% घटा। पाकिस्तान में बाढ़ ने 45% फसलें बर्बाद कीं। इसी प्रकार, बांग्लादेश में चक्रवातों ने खाद्य भंडार नष्ट किए। ये घटनाएँ खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने चेतावनी दी है। 2030 तक कृषि उत्पादकता 21% कम हो सकती है। यह खाद्य संकट को गहराएगा।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव

भुखमरी का सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। डब्ल्यूएचओ के आँकड़े चौंकाने वाले हैं। यमन में 50% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इसी तरह, सूडान में हैजा के मामले 300% बढ़े हैं। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली बीमारियों को न्यौता देती है। बच्चों का शारीरिक-मानसिक विकास रुक जाता है। यह पूरी पीढ़ी के भविष्य को खतरे में डालता है।

वैश्विक प्रयासों की कमी

अंतर्राष्ट्रीय सहायता कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं। यूएनडब्ल्यूएफपी के बजट में 40% की कटौती हुई है। यमन और सूडान में 50% से अधिक खाद्य सहायता रुकी है। इसके विपरीत, संघर्ष क्षेत्रों में मानवीय पहुँच बाधित है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान प्रतिबंधों ने स्थिति बिगाड़ी है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2025 तक सहायता की आवश्यकता दोगुनी हो जाएगी।

दक्षिण एशिया में स्थिति

बांग्लादेश और पाकिस्तान में संकट गहरा रहा है। बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी दबाव बढ़ा रहे हैं। पाकिस्तान में आर्थिक संकट ने खाद्य कीमतें 40% बढ़ाईं। भारत में भी 7.4 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं। एफएओ की रिपोर्ट इस क्षेत्र को “उच्च जोखिम” वाला बताती है। मानसून अनिश्चितता ने चावल उत्पादन प्रभावित किया है।

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भविष्य के लिए समाधान

स्थायी खाद्य सुरक्षा हेतु तत्काल कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, कृषि अनुकूलन कार्यक्रमों में निवेश बढ़ाना होगा। जल संरक्षण तकनीकों को प्राथमिकता देनी चाहिए। दूसरी ओर, स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मजबूत करना जरूरी है। किसानों को मौसम-रोधी बीज उपलब्ध कराने होंगे। अंत में, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से ही इस भुखमरी संकट का समाधान संभव है। विश्व खाद्य कार्यक्रम का सुझाव है। संघर्ष क्षेत्रों में “खाद्य गलियारे” स्थापित किए जाएँ।

निष्कर्ष

खाद्य असुरक्षा का संकट वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। जलवायु परिवर्तन और संघर्ष इसकी प्रमुख वजह हैं। बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों को तत्काल सहायता की आवश्यकता है। टिकाऊ समाधानों पर ध्यान देकर ही हम भविष्य में इस चुनौती से निपट सकेंगे। सामुदायिक स्तर पर कृषि पहल भी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संसाधन जुटाने होंगे।

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