शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि: एक महान आदिवासी नेता के सफर का अंत
प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति मुर्मू और कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे प्रमुख आदिवासी नेता शिबू सोरेन के निधन पर शोक व्यक्त किया। 81 वर्ष की आयु में उनका निधन सोमवार को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में हुआ, जहाँ वे किडनी संबंधी समस्याओं का इलाज करा रहे थे। उनके निधन से राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर गंगा राम अस्पताल जाकर दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके परिवार से भी मिलकर सांत्वना दी।
- शिबू सोरेन ने झारखंड के लिए एक राज्य बनाने का सपना पूरा किया।
- उनके निधन से झारखंड के आदिवासियों को गहरा आघात पहुंचा है।
- उन्होंने अपने जीवनकाल में सूदखोरों और शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन चलाए।
प्रधानमंत्री ने संताली भाषा में दी श्रद्धांजलि
PM मोदी ने शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देने के बाद एक्स पर संताली भाषा में एक पोस्ट साझा किया। संताली भाषा में लिखे इस पोस्ट में उन्होंने हेमंत जी और कल्पना जी सहित शिबू सोरेन के प्रशंसकों के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त कीं। यह भाषा लगभग 70-80 लाख लोगों द्वारा बोली जाती है और 2003 में इसे भारत की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसे आधिकारिक मान्यता मिली यह संताली भाषा और संथाल संस्कृति के प्रति प्रधानमंत्री के गहरे सम्मान को दर्शाता है। इससे पहले, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अस्पताल जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
- संताली भाषा की अपनी विशिष्ट ओल चिकी लिपि है जो 1925 में बनी थी।
- यह भाषा संथाल आदिवासी समुदाय द्वारा मुख्य रूप से बोली जाती है।
- प्रधानमंत्री ने यह कदम संथाली भाषा और समुदाय के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए उठाया।
एक दूरदर्शी नेता की विरासत
शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि उनके पिता की विरासत हमेशा जीवित रहेगी। शिबू सोरेन, जिन्हें उनके अनुयायी ‘गुरुजी’ कहते थे, तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और आठ बार लोकसभा सदस्य रहे। वे राज्यसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री भी रहे। भाजपा की झारखंड इकाई के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी शिबू सोरेन के निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सोरेन ने सार्वजनिक जीवन को बहुत कुछ दिया है और उनके निधन से झारखंड में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
ने भी शिबू सोरेन के निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सोरेन ने सार्वजनिक जीवन को बहुत कुछ दिया है और उनके निधन से झारखंड में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
- शिबू सोरेन ने लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से आदिवासी वर्चस्व की विरासत छोड़ी है।
- वह एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अपने लोगों के लिए एक अलग राज्य जीता।
- उनकी जीवनी झारखंडी पहचान और राज्य के उदय का पर्याय है।
झारखंड आंदोलन के अग्रदूत
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के महासचिव के रूप में 1973 में शुरू हुआ था। उस समय, वे एक युवा नेता थे जो आदिवासियों पर हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। बाद में, सोरेन ने वामपंथी राजनीति से दूरी बना ली, क्योंकि वे आदिवासी नेतृत्व का समर्थन नहीं करते थे। शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देते हुए एफजेसीसीआई ने कहा कि उनका जीवन संघर्ष और जन कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक था।सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) ने भी शोक सभा आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। सीसीएल ने एक बयान में कहा कि वे झारखंड आंदोलन के अग्रदूत और एक निडर नेता थे, जिन्होंने राष्ट्रीय मंच पर आदिवासी अधिकारों की आवाज को बुलंद किया।
- शिबू सोरेन के आंदोलन का उद्देश्य झारखंड के लिए एक अलग राज्य प्राप्त करना था।
- झारखंड के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
- वे अपने जीवनकाल में एक समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने शराबबंदी के लिए आंदोलन चलाए।



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