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प्रयागराज माघ मेला 2026: शंकराचार्य का अपमान और मणिकर्णिका विवाद

प्रयागराज माघ मेला 2026

यह देश अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ हिंदू धर्म की सबसे ऊँची जगद्गुरु शंकराचार्य की आध्यात्मिक कुर्सी पर बैठे संत से सरकारी नोटिस के जरिए “प्रमाण-पत्र” माँगा जा रहा है। प्रयागराज माघ मेला 2026 में मौनी अमावस्या के दिन वह हृदयविदारक दृश्य देखने को मिला, जब ज्योतिर्मठ (उत्तराम्नाय ज्योतिषपीठ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पालकी को पुलिस प्रशासन द्वारा बलपूर्वक रोका गया।

इस दौरान उनके शिष्यों के साथ पुलिस द्वारा धक्का-मुक्की, छत्र तोड़ने और मारपीट की घटनाएँ हुईं, जिसने पूरे संत समाज को झकझोर कर रख दिया है। प्रशासन ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए रात के अंधेरे में स्वामी जी को नोटिस थमाया कि वे 24 घंटे में साबित करें कि वे शंकराचार्य हैं।

प्रशासनिक हठधर्मिता और सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का अपमान

मेला प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के उस अंतरिम आदेश का हवाला दिया है, जिसमें ज्योतिर्मठ पर पट्टाभिषेक पर रोक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कोई प्रशासनिक अधिकारी या राज्य सरकार यह फैसला कर सकती है कि सदियों पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा, अन्य पीठों के समर्थन और अखाड़ों की चादर ओढ़ाने से स्थापित शंकराचार्य कौन है?

स्वामी जी ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए स्पष्ट कहा कि राष्ट्रपति या कोई सरकार यह तय नहीं कर सकती कि कौन शंकराचार्य है, यह पूरी तरह से धार्मिक मामला है। प्रयागराज माघ मेला 2026 के इस विवाद ने ज्योतिर्मठ के भक्तों में भारी रोष भर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप यूपी सरकार का पुतला फूंका गया और प्रशासन से माफी की मांग की गई।

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मोदी-योगी सरकार की ‘हिंदू हितैषी’ छवि पर गहराते गंभीर सवाल

यह घटना मोदी-योगी सरकार की दोहरी नीति को पूरी तरह बेनकाब कर रही है, जो “हिंदू हितैषी” का नारा देकर तीन बार सत्ता में आई लेकिन अब सनातन परंपराओं पर ही हमला बोल रही है। एक तरफ प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री पर सवाल उठाने वालों को “फर्जी” कहा जाता है, लेकिन दूसरी ओर हिंदू धर्म के सर्वोच्च गुरु से प्रमाण-पत्र माँगना “प्रशासनिक प्रक्रिया” बन जाता है। कांग्रेस ने इसे सीधा “अत्याचार” करार दिया है।

विपक्षी दलों का कहना है कि जब तक संत सरकार के खिलाफ नहीं बोलते, तब तक वे शंकराचार्य हैं, लेकिन जैसे ही वे व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, उनसे कागजी सबूत माँगे जाने लगते हैं।

अखाड़ा परिषद का आक्रोश और धार्मिक स्वायत्तता पर गहराता खतरा

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरि महाराज ने इस प्रकरण को “प्रयाग की गरिमा पर चोट” बताया है। प्रयागराज माघ मेला 2026 के शिविरों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत और परंपरा पर आधारित है।

जहाँ एक ओर विरोधी पक्ष (जैसे वासुदेवानंद) पर फर्जी वसीयत और व्यक्तिगत विवादों के आरोप लगते हैं, वहीं स्वामी जी ने प्रश्न उठाया कि जब दो अन्य पूर्ण शंकराचार्यों के कैंप को अनुमति मिली, तो उनके शिविर पर नोटिस क्यों? यह साफ दिखाता है कि प्रशासनिक हस्तक्षेप अब धार्मिक स्वायत्तता को कुचलने पर आमादा है।

मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजर: विकास के नाम पर विरासत का विनाश

आस्था पर चोट का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। काशी के मणिकर्णिका घाट पर तोड़-फोड़ का मामला एक और गहरा घाव है। जनवरी 2026 में ₹17.56 करोड़ के रीडिवेलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत पुरानी संरचनाएँ, मढ़ी, शिवलिंग और यहाँ तक कि रानी अहिल्याबाई होल्कर की सदियों पुरानी मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

पुरोहितों और स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि जेसीबी से बिना किसी पूर्व सूचना के यह बर्बरता की गई। जहाँ सरकार इसे “सौंदर्यीकरण” और वायरल तस्वीरों को “AI-जनरेटेड फेक” बता रही है, वहीं ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

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महाश्मशान को ‘टूरिस्ट स्पॉट’ बनाने की जिद्द और संतों का विरोध

योगी आदित्यनाथ ने सफाई दी कि कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया और पुरानी तस्वीरों (2021 काशी विश्वनाथ कॉरिडोर) के जरिए भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि विकास से भक्तों की संख्या 1.5 लाख तक पहुंच गई है। लेकिन प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव ने इसे “महापाप” और “हिंदू विरासत का विनाश” कहा है।

आलोचकों का तर्क है कि महाश्मशान, जो मोक्ष की स्थली है, उसे “टूरिस्ट स्पॉट” में बदला जा रहा है। ईको-फ्रेंडली सुविधाओं और वीआईपी सीटिंग के नाम पर परंपराओं को दरकिनार करना हिंदू समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

क्या हिंदुत्व अब केवल एक राजनीतिक वोट बैंक बनकर रह गया है?

BJP और RSS, जो खुद को हिंदू धर्म का रक्षक बताते हैं, आज उन्हीं की सत्ता में ज्योतिर्मठ शंकराचार्य से कागज माँगे जा रहे हैं और मणिकर्णिका जैसे पवित्र घाट पर बुलडोजर चल रहे हैं। यह कैसा हिंदू राष्ट्रवाद है? यह स्पष्ट है कि सत्ता मिलते ही परंपराएँ, गुरु-शिष्य व्यवस्था और जन-आस्था को कुचला जा रहा है।

प्रयागराज माघ मेला 2026 में स्वामी जी ने यहाँ तक कहा कि पालकी से उतारते ही उनकी हत्या की साजिश रची गई थी और भीड़-भगदड़ का बहाना बनाकर उन्हें खत्म करने की योजना थी।

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सनातन धर्म की रक्षा के लिए अब जागने का समय आ गया है

ये दोनों घटनाएँ—प्रयागराज का अपमान और काशी का विनाश—सनातन धर्म पर सीधा राजनीतिक हमला हैं। सरकार को यह समझना होगा कि हिंदू आस्था कागजों, नोटिसों या डीपीआर (DPR) से नहीं चलती; यह संतों की गरिमा और सदियों की श्रद्धा से जीवित है।

विकास आवश्यक है, लेकिन संतों और पुरोहितों के परामर्श के बिना किया गया कार्य विनाशकारी होता है। अब समय आ गया है कि इस “ढोंग” को उजागर किया जाए और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए, अन्यथा इतिहास साक्षी रहेगा कि संतों का अपमान करने वालों का अंत निश्चित है।

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