अरावली खनन पर रोक और सुप्रीम कोर्ट का एक्सपर्ट पैनल बनाने का फैसला
अरावली खनन पर रोक के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पहाड़ियों की परिभाषा की फिर से जांच करने और माइनिंग से जुड़ी पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए अपनी निगरानी में एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने के लिए सुझाव मांगे हैं। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल पंचोली की बेंच ने साफ किया कि प्रस्तावित पैनल उसकी सीधी निगरानी और कंट्रोल में काम करेगा।
इस दौरान एक इंटरवीनर की ओर से पेश सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि पहाड़ों को सख्त परिभाषाओं के अधीन नहीं किया जा सकता है। उन्होंने बदलती जियोलॉजिकल बनावट की ओर इशारा करते हुए इस मुद्दे पर एक छोटी शुरुआती सुनवाई की मांग की है।
एक्सपर्ट कमेटी के लिए मांगे गए विशेषज्ञों के नाम
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और इस क्षेत्र में माइनिंग से जुड़े पर्यावरण संबंधी मुद्दों की जांच के लिए कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने केंद्र और राज्यों की ओर से पेश एमिकस क्यूरी और वकीलों से कमेटी में शामिल करने के लिए जाने-माने पर्यावरणविदों और फॉरेस्ट एक्सपर्ट्स के नाम सुझाने को कहा है।
बेंच ने एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और केएम नटराज के साथ-साथ अन्य वकीलों को एक पूरा नोट देने का निर्देश दिया है। इस नोट में उन मुद्दों की पहचान की जाएगी जिन पर विचार होना है और उपयुक्त एक्सपर्ट्स के नाम बताए जाएंगे। कोर्ट का मानना है कि यह एक्सपर्ट बॉडी विवाद के सभी पहलुओं पर उसकी सहायता करेगी।
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अवैध माइनिंग से होने वाले अपूरणीय नुकसान पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह अरावली में माइनिंग और उससे जुड़े मामलों की पूरी जांच करने के लिए डोमेन एक्सपर्ट्स वाली एक समिति बनाएगा। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अरावली खनन पर रोक के बावजूद होने वाली गैर-कानूनी माइनिंग से ऐसा नुकसान हो सकता है जिसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को चार हफ्तों के भीतर पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम देने का निर्देश दिया है। ये विशेषज्ञ माइनिंग में विशेष अनुभव रखने वाले होंगे ताकि इन तकनीकी और पर्यावरणीय पहलुओं पर गंभीरता से गौर किया जा सके।
पुरानी परिभाषा पर रोक और कोर्ट का सख्त रुख
बेंच ने निर्देश दिया कि यह कमेटी पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्शन और सुपरविज़न में काम करेगी। इसके साथ ही कोर्ट ने अपने उस आदेश को भी आगे बढ़ा दिया है जिसमें 20 नवंबर के निर्देशों पर रोक लगा दी गई थी। गौरतलब है कि 20 नवंबर को अरावली की पहाड़ियों और रेंज की एक जैसी परिभाषा को स्वीकार किया गया था, जिसे अब चुनौती दी जा रही है।
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि राज्य में कोई भी बिना इजाजत माइनिंग नहीं होगी, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया है।
कपिल सिब्बल की दलील: पहाड़ों को डिफाइन करना मुश्किल
अरावली हिल्स विवाद में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने एक अहम कानूनी और भौगोलिक पहलू पेश किया। उन्होंने कहा कि पहाड़ों को सख़्त शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता। सिब्बल के अनुसार, हिमालय के उलट—जो साफ़ सब-टेक्टोनिक स्ट्रेटा पर टिका है—अरावली की संरचना जियोलॉजिकली जटिल और विविधतापूर्ण है।
उन्होंने चेतावनी दी कि एक जैसी परिभाषा लागू करने की कोशिश से नई रेगुलेटरी और इकोलॉजिकल दिक्कतें पैदा हो सकती हैं, जिससे रेंज का एक बड़ा हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। कोर्ट ने भी माना कि “जंगल” और “अरावली” को परिभाषित करने के सवालों की अलग-अलग जांच की जाएगी।
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नई याचिकाओं पर रोक और अवैध माइनिंग पर लगाम
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली मामले में नई रिट याचिकाओं पर फिलहाल रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट उस मामले में नई पिटीशन पर विचार नहीं करेगा जिसे उसने पहले ही स्वतः संज्ञान में ले लिया है। बेंच का मानना है कि नई फाइलिंग से मुख्य सवालों से ध्यान भटकने का खतरा है।
कोर्ट ने राजस्थान के अधिकारियों से अवैध माइनिंग रोकने वाली मशीनरी को सक्रिय करने को कहा है। राज्य के वकील ने भरोसा दिलाया कि 29 दिसंबर, 2025 को जारी अंतरिम निर्देश लागू रहेंगे और अरावली खनन पर रोक का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाएगा।
100 मीटर की परिभाषा पर उपजा विवाद
अरावली पर विवाद तब गहराया जब सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर, 2025 के आदेश में एक वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया था। इसके तहत कहा गया था कि सिर्फ वही लैंडफॉर्म ‘पहाड़ी’ कहलाएंगे जो आसपास के इलाके से 100 मीटर या उससे अधिक ऊपर उठे हों।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 (8.7%) ही इस क्राइटेरिया को पूरा करती हैं।
इस फैसले के बाद पर्यावरणविदों और सिविल सोसाइटी में चिंता फैल गई कि इससे बड़े हिस्से की सुरक्षा खत्म हो जाएगी। रिपब्लिक टीवी के कैंपेन ने भी इस मुद्दे की गंभीरता को जनता के सामने रखा, जिससे अरावली खनन पर रोक और सुरक्षा को लेकर बहस तेज हुई।
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इकोलॉजिकल सुरक्षा के लिए भविष्य का रोड मैप
अब कोर्ट का इरादा डोमेन एक्सपर्ट्स की टीम के माध्यम से एक ऐसा रोड मैप तैयार करना है, जिससे दुनिया के सबसे पुराने माउंटेन सिस्टम की सुरक्षा हो सके। यह कमेटी पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, फॉरेस्टर्स और रेगुलेटेड माइनिंग के विशेषज्ञों से मिलकर बनेगी।
यह बॉडी पुरानी रिपोर्ट्स का रिव्यू करेगी और यह तय करेगी कि कहां कानून के तहत सीमित गतिविधियां संभव हैं। एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को अरावली की परिभाषा पर विस्तृत नोट देने के लिए चार हफ्ते का समय मिला है।
तब तक 100 मीटर की परिभाषा पर अंतरिम रोक जारी रहेगी, क्योंकि अरावली केवल पहाड़ नहीं बल्कि रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल और ग्राउंडवाटर रिचार्ज की लाइफलाइन है।
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