कुलदीप सेंगर जमानत विवाद: न्याय के लिए तरसती उन्नाव की बेटी
देश को हिला देने वाले उन्नाव रेप कांड में कुलदीप सेंगर जमानत विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत मिलना भारत में महिला सुरक्षा की उस दयनीय स्थिति को उजागर करता है, जिस पर सरकार अक्सर चुप्पी साध लेती है।
मोदी सरकार की ओर से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे महत्वाकांक्षी अभियान चलाए जाने के बावजूद, न्याय की कछुआ चाल अपराधियों के हौसले बुलंद कर रही है। साल 2019 में आजीवन कारावास की सजा पाने वाले सेंगर की सजा को दिसंबर 2025 में निलंबित करना और उसे सशर्त जमानत देना उस पीड़िता के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, जो वर्षों से शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेल रही है।
पीड़िता की पुकार: “यह जमानत नहीं, मेरे लिए काल है”
न्याय के गलियारों से आई इस खबर ने पीड़िता को झकझोर कर रख दिया है। उसने इस अदालती फैसले को अपनी भाषा में “काल” यानी मृत्यु करार दिया है। पीड़िता का कहना है कि सजा का निलंबन उसके घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। वह और उसका परिवार आज भी खौफ के साए में जीने को मजबूर है।
सुरक्षा के तमाम दावों के बीच, पीड़िता अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। उसकी आँखों में छलकते आँसू और कांपती आवाज इस बात की तस्दीक करती है कि जब रसूखदार अपराधी जेल से बाहर आते हैं, तो न्याय का गला घोंट दिया जाता है।
इसे भी पढ़े :–अमेरिकी कोर्ट में पाँचवीं बार टला अडानी, समन, भारत केस: न्याय का मज़ाक
सड़क पर संग्राम: योगिता भयाना और पीड़िता का इंडिया गेट पर धरना
कल देश की राजधानी दिल्ली का इंडिया गेट एक भावुक और आक्रोशित विरोध का गवाह बना। यहाँ कुलदीप सेंगर जमानत विवाद के विरोध में पीड़िता, उसकी माँ और प्रसिद्ध एंटी-रेप एक्टिविस्ट योगिता भयाना शांतिपूर्ण धरने पर बैठीं। पीड़िता ने सिसकते हुए अपने दिल का हाल बयां किया और कहा, “जमानत मिलते ही मैंने खुद को खत्म करने की सोची थी, लेकिन परिवार के बारे में सोचकर रुक गई।
” वहीं, पीड़िता की माँ की मांग स्पष्ट थी कि सेंगर की जमानत तत्काल रद्द की जाए, अन्यथा उनकी जान को गंभीर खतरा है। यह दृश्य बताता है कि भारत की बेटियां आज भी अपनों को खोकर भी इंसाफ के लिए सड़कों पर बैठने को मजबूर हैं।
योगिता भयाना: निर्भया से लेकर उन्नाव तक इंसाफ की बुलंद आवाज
इस पूरे विरोध प्रदर्शन का प्रमुख चेहरा योगिता भयाना बनीं, जिन्होंने 2012 के निर्भया कांड के बाद से ही देश में महिला सुरक्षा के लिए एक अलख जगाई है। People Against Rape in India (PARI) की संस्थापक योगिता ने ही जुवेनाइल जस्टिस कानून में बदलाव के लिए ऐतिहासिक अभियान चलाया था।
योगिता, जो हाथरस और दिल्ली कैंट जैसे मामलों में भी पीड़िताओं का संबल बनी हैं, एक POSH एक्सपर्ट भी हैं और जेंडर सेंसिटाइजेशन की ट्रेनिंग देती हैं। उन्नाव मामले में उन्होंने पीड़िता के परिवार के अकेलेपन पर दुख जताते हुए कहा कि यह विडंबना है कि “रेपिस्ट जमानत पर बाहर है और निर्दोष जेल में।”
इसे भी पढ़े :–न्यायमूर्ति सूर्यकांत CJI: अनुच्छेद 370 फैसला, ऐतिहासिक सफर की शुरुआत।
पुलिसिया कार्रवाई और नारी शक्ति के दावों पर कड़ा प्रहार
विरोध के दौरान दिल्ली पुलिस का रवैया बेहद विवादास्पद रहा। शांतिपूर्ण धरने पर बैठी पीड़िता, उसकी माँ और योगिता भयाना को दिल्ली पुलिस ने जबरन वहां से हटा दिया। उन्हें CRPF की बस में ठूस दिया गया और आरोप है कि पीड़िता की माँ को चलती बस से उतारने की कोशिश की गई, जिससे वे घायल हो गईं।
कुलदीप सेंगर जमानत विवाद के बीच हुई यह घटना सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। एक तरफ मोदी राज में ‘नारी शक्ति’ का गुणगान किया जाता है, तो दूसरी तरफ अपने हक की मांग करने वाली महिलाओं को हिरासत में लेकर उनके दमन की कोशिश की जाती है।
राजनीतिक घमासान: सिस्टम की विफलता पर राहुल गांधी के तीखे सवाल
इस मामले ने अब राजनीतिक रूप भी अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पूरे प्रकरण को शर्मनाक बताते हुए पीड़ित परिवार से मुलाकात की और सिस्टम की विफलता पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने इसे भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक धब्बा करार दिया।
मोदी सरकार के 11 वर्षों के कार्यकाल पर नजर डालें, तो NCRB के आंकड़े गवाही देते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, लेकिन दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का अभाव दिखता है। सेंगर जैसे रसूखदार व्यक्ति को जमानत मिलना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि प्रभाव और पहुंच कानून से ऊपर हो सकते हैं।
इसे भी पढ़े :–“एआई और न्याय व्यवस्था” बदलेगा: जस्टिस विक्रम नाथ का बड़ा बयान।
कागजी नीतियां और पीड़िता की जान पर मंडराता खतरा
महिला सुरक्षा को लेकर सरकार की नीतियां केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही हैं। उन्नाव केस में जिस तरह से पीड़िता की जान पर बार-बार हमले हुए, उसके पिता की हत्या की गई, परिवार के सदस्य मारे गए और वकील तक की संदिग्ध मौत हुई, उसके बावजूद उसे वह ठोस सुरक्षा नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी।
आज कुलदीप सेंगर जमानत विवाद के कारण वह फिर से उसी दहशत में लौट आई है। योगिता भयाना जैसे एक्टिविस्ट्स की मौजूदगी ही अब इन पीड़िताओं के लिए उम्मीद की आखिरी किरण बची है, जो तंत्र के खिलाफ अकेले मोर्चा संभाले हुए हैं।
न्यायपालिका की साख और राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा
अंततः, यह फैसला न केवल न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दर्शाता है। जब सत्ताधारी दल से जुड़े किसी प्रभावशाली आरोपी को राहत मिलती है, तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा खोखला महसूस होने लगता है।
विपक्ष का यह आरोप कि केंद्र न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करता है, इस मामले के बाद और भी गंभीर हो जाता है। यदि सरकार ने तत्काल तेज न्याय और पीड़ित सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की, तो भारतीय न्याय प्रणाली से महिलाओं का अटूट विश्वास पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
इसे भी पढ़े :–सत्ता बनाम न्यायपालिका: सीजेआई गवई पर जूता हमला क्यों?



Post Comment