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किंगमेकर्स की चुप्पी और अडानी साम्राज्य का खतरनाक विस्तार

किंगमेकर्स की चुप्पी

किंगमेकर्स की चुप्पी और मोदी सरकार की सरपरस्ती में जिस तरह से अडानी ग्रुप को देश के प्रमुख संसाधनों पर कब्जा करने की खुली छूट दी गई है, वह न सिर्फ डरावना है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा प्रहार है। 2025-2026 में जारी इकोनॉमिक टाईम्स और फॉर्च्यून इंडिया जैसी प्रतिष्ठित रिपोर्ट्स से यह शीशे की तरह साफ हो चुका है कि अडानी ग्रुप ने कोल पावर सेक्टर में $7.17 बिलियन का भारी-भरकम निवेश किया है।

इसमें असम में सेटअप किया गया 3.2GW का ग्रीनफील्ड थर्मल प्लांट शामिल है। आज पोर्ट्स, एयरपोर्ट्स, रिन्यूएबल एनर्जी से लेकर सीमेंट तक अडानी का विस्तार हो चुका है, जिसे गौतम अडानी खुद “भारत की सोवरेनिटी के लिए संसाधनों पर मास्टरी” का नाम देते हैं। लेकिन हकीकत में यह “मास्टरी” केवल अडानी की है, देश की नहीं।

हसदेव के जंगलों की बलि और लोकतंत्र का बदलता स्वरूप

पर्यावरण को ताक पर रखकर हसदेव अरण्य फॉरेस्ट में लाखों पेड़ों की कटाई कर कोल माइनिंग का काम बदस्तूर जारी है। डाउन टू अर्थ और द हिन्दू की 2025 की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी एंटरप्राइजेज के ऑपरेशन में केंटे एक्सटेंशन ब्लॉक के लिए 1,742 हेक्टेयर फॉरेस्ट डायवर्शन किया गया है, जो पारिस्थितिकी को बर्बाद कर रहा है।

एक तरफ “हिंदू खतरे में हैं” का भावनात्मक नारा देकर जनता को उलझाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सत्ता की साजिश से लोकतंत्र ‘अडानीतंत्र’ में तब्दील हो रहा है। इसका प्रमाण यह है कि 2025 में ग्रुप का EBITDA ₹90,000 करोड़ के पार चला गया है, जबकि आम भारतीय आज भी कमरतोड़ महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहा है।

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जल, जंगल और जमीन पर अडानी का पूर्ण कब्जा

आज देश के जल, जंगल और जमीन पर अडानी का कब्जा अपनी पूर्णता की ओर है। अडानी वाच की 2024-2025 की रिपोर्ट्स कोयला आयात में आए भारी उछाल की तस्दीक करती हैं। बिजली उत्पादन में अडानी पावर का दबदबा इस कदर बढ़ गया है कि FY32 तक 18.15 GW से 41.87 GW उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए ₹2 लाख करोड़ का निवेश प्रस्तावित है।

पानी, अनाज, सीमेंट (मार्च 2026 तक 118 MTPA क्षमता), और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मिलिट्री सप्लाई तक में अडानी का दखल है। मुंबई और गुवाहाटी जैसे 6 मेजर एयरपोर्ट कन्सेशंस और मुंद्रा सहित अंतरराष्ट्रीय पोर्ट्स पर 30% से अधिक कार्गो का नियंत्रण अब एक ही हाथ में है।

सिस्टेमेटिक फेवरिटिज्म और अंतरराष्ट्रीय जांचों पर चुप्पी

यह कोई संयोग नहीं बल्कि एक सिस्टेमेटिक फेवरिटिज्म है। 2025 में विझिंजम पोर्ट फेज-1 का ऑपरेशनल होना और नवी मुंबई एयरपोर्ट के पहले फेज की शुरुआत, यह सब अडानी के साम्राज्य का विस्तार है। 2023 की हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद भी स्टॉक मैनिपुलेशन और अकाउंटिंग फ्रॉड के आरोपों पर सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

किंगमेकर्स की चुप्पी ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है, जबकि US ब्राइबरी चार्जेस ($265 मिलियन), OCCRP और फाइनेंशियल टाईम्स की 2024-2025 की रिपोर्ट्स में गंभीर खुलासे हुए हैं। “अडानी रिपब्लिक” का डर अब एक कड़वी सच्चाई बन चुका है, जहाँ देश के कीमती संसाधन एक व्यक्ति के निजी साम्राज्य की भेंट चढ़ गए हैं।

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नरेंद्र मोदी और क्रोनी कैपिटलिज्म का नया शिखर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अडानीतंत्र के मुख्य सूत्रधार के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने “क्रोनी कैपिटलिज्म” को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। इंटरनेशनल पॉलिसी डाइजेस्ट और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट्स के अनुसार, मोदी के कार्यकाल में अडानी की वेल्थ में $4.1 बिलियन का इजाफा हुआ।

विदेशी एनर्जी डील्स से लेकर एयरपोर्ट कन्सेशंस तक, हर जगह अडानी को फायदा पहुँचाया गया। वाशिंग्टन पोस्ट की जांच बताती है कि 2025 में LIC द्वारा $3.9 बिलियन का निवेश प्लान भी सरकार द्वारा “कॉन्फिडेंस सिग्नल” के नाम पर पुश किया गया था। राहुल गांधी के आरोप अब अमेरिकी अदालतों के ब्राइबरी केस (2024-2025) में सच साबित होते दिख रहे हैं, लेकिन सरकार इसे “प्राइवेट मैटर” बताकर पल्ला झाड़ रही है।

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अमित शाह की नीतियां और जांच एजेंसियों की सुस्ती

अमित शाह, जिन्हें मोदी का दाहिना हाथ माना जाता है, इस पूरे नेक्सस के दूसरे बड़े किरदार हैं। 2024-2025 की NDA मीटिंग्स में शाह ने एक तरफ नीतीश और नायडू जैसे एलाइज को मैनेज किया, तो दूसरी तरफ अडानी के लिए कोल माइनिंग रिफॉर्म्स और इंफ्रा प्रोजेक्ट्स जैसी नीतियों को मजबूती से आगे बढ़ाया।

अल जज़ीरा की रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया के आरोपों की मानें तो “मोदी मीडिया” का इस्तेमाल अडानी के पक्ष में नैरेटिव बनाने के लिए किया गया। किंगमेकर्स की चुप्पी का फायदा उठाकर होम मिनिस्ट्री ने कथित तौर पर स्टॉक मैनिपुलेशन और फ्रॉड की जांचों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यह छद्म देशभक्ति है, जो वास्तव में अडानी के आर्थिक हितों की रक्षा कर रही है।

नीतीश और नायडू: सत्ता की खातिर सिद्धांतों से समझौता

नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं की भूमिका इस पूरे प्रकरण में बेहद विवादास्पद रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो कभी मोदी के कट्टर विरोधी थे, अब एक “ट्रस्टेड एलाइ” बनकर बिहार की गरीबी की कीमत पर अडानी के सीमेंट और स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट्स का रास्ता साफ कर रहे हैं।

वहीं, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने स्पेशल स्टेटस के बदले मोदी 3.0 को समर्थन दिया, लेकिन अडानी के पोर्ट्स विस्तार और धारावी रिडेवलपमेंट जैसे विवादास्पद प्रोजेक्ट्स पर मौन साधे रखा। इन किंगमेकर्स की चुप्पी ही वह आधार है, जिस पर आज अडानी का विशालकाय साम्राज्य टिका हुआ है।

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अंधभक्ति का परिणाम और लोकतंत्र का भविष्य

अंततः, इस अडानीतंत्र के लिए वे नागरिक भी जिम्मेदार हैं जो “हिंदू खतरे में हैं” के शोर में बुनियादी मुद्दों को भूल गए हैं। हसदेव में आदिवासियों के अधिकारों का हनन हो या “मोदी सेलिंग इंडिया टू अडानी” जैसे गंभीर विषय, अंधभक्ति ने तर्क की जगह अंधविश्वास को दे दी है।

रिपब्लिक जैसे चैनलों पर परोसी जा रही “देशभक्ति” वास्तव में कॉर्पोरेट लूट का कवर है। यदि 2029 तक यही स्थिति रही, तो भारत का “अडानी रिपब्लिक” बनना तय है। तब पछतावा करने का कोई अर्थ नहीं रहेगा, क्योंकि जब देश के समस्त संसाधन एक ही हाथ की कठपुतली बन जाएंगे, तो वह भारतीय लोकतंत्र का अंतिम अध्याय होगा।

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