सोनम वांगचुक की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को सख्त फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी, डॉ. गीतांजलि जे. अंगमो द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में वांगचुक को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) में रखे जाने को चुनौती दी गई है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और लेह प्रशासन द्वारा दी गई दलीलों की बारीकी से जांच की।
सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष का माहौल तब काफी गंभीर हो गया जब बहस महात्मा गांधी के आदर्शों और वांगचुक द्वारा दिए गए भाषणों के वास्तविक निहितार्थ पर केंद्रित हो गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी के बयानों का अर्थ निकालने में निष्पक्षता अनिवार्य है।
भाषणों के अर्थ पर न्यायिक मंथन और गांधीवादी सिद्धांतों का जिक्र
अदालत में केंद्र सरकार की ओर से वांगचुक की प्रिवेंटिव डिटेंशन का बचाव किया गया। डिटेनिंग अथॉरिटी ने वांगचुक के उन भाषणों का हवाला दिया जिनमें वे युवाओं के “गांधीवादी” शांतिपूर्ण विरोध के तरीकों से भरोसा खोने और राज्य की मांगों को लेकर हिंसक प्रदर्शनों की संभावना पर चिंता व्यक्त कर रहे थे।
हालांकि, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने इन दलीलों पर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि आखिर इन भाषणों से हिंसा का अर्थ कैसे निकाला जा रहा है?
बेंच ने टिप्पणी की कि वांगचुक तो युवाओं के बदलते रुख पर खुद हैरान और चिंतित दिख रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि वह हिंसा की वकालत कहाँ कर रहे हैं? वे तो केवल उस स्थिति पर अपनी चिंता और हैरानी जता रहे हैं।
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सॉलिसिटर जनरल की दलील: वांगचुक की सेहत पूरी तरह स्थिर
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सोनम वांगचुक की हिरासत के दौरान उनकी सेहत को लेकर चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेहता ने कहा कि एक्टिविस्ट “फिट, तंदुरुस्त और चंगे” हैं।
जेल मैनुअल के अनुसार अब तक उनकी 28 बार मेडिकल जांच की जा चुकी है। हालांकि प्रशासन ने स्वीकार किया कि उन्हें पाचन संबंधी कुछ मामूली समस्याएं थीं, लेकिन उनका उचित उपचार किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और उनकी शारीरिक स्थिति हिरासत जारी रखने में कोई बाधा नहीं है।
संदर्भ से बाहर बयानबाजी पर कोर्ट की केंद्र को नसीहत
केंद्र की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज ने तर्क दिया कि वांगचुक की टिप्पणियों की तुलना नेपाल की हिंसक स्थितियों से की जा सकती है, जिससे भारत में भी वैसे ही आंदोलन भड़कने का डर है। इस पर बेंच ने कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि किसी भी भाषण को टुकड़ों में काटकर नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी बात और उसका संदर्भ रिकॉर्ड पर रखा जाए। जजों ने कहा, “आप सिर्फ एक वाक्य पढ़कर निष्कर्ष नहीं निकाल सकते, पूरी बात पढ़ें।” अदालत ने माना कि वांगचुक यह कह रहे हैं कि गांधीवादी रास्ते से अलग होना चिंताजनक है और यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसका स्वागत किया जाए।
गांधी जी से तुलना पर केंद्र की आपत्ति और कोर्ट का रुख
बहस के दौरान महात्मा गांधी के आखिरी उपवास के भाषण का जिक्र आने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि ऐसी किसी भी गतिविधि की सराहना नहीं की जानी चाहिए जो भारत विरोधी हो।
मेहता ने जोर देकर कहा कि वांगचुक की तुलना राष्ट्रपिता से नहीं की जानी चाहिए और उन्होंने मीडिया हेडलाइंस को लेकर भी चिंता जताई।
हालांकि, बेंच ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि गांधी जी का जिक्र केवल देश के लिए बलिदान देने की उनकी बातों के संदर्भ में किया गया था, न कि वांगचुक और गांधी की कोई सीधी तुलना करने के उद्देश्य से। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि वह इस मामले को अनावश्यक रूप से तूल क्यों दे रही है।
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मेडिकल ग्राउंड पर रिहाई की मांग का कड़ा विरोध
सॉलिसिटर जनरल ने सोनम वांगचुक की हिरासत को मेडिकल आधार पर खत्म करने के किसी भी सुझाव का विरोध किया। उन्होंने ऐसी अपीलों को “सोशल मीडिया का दिखावा” करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों में इस तरह की छूट देना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
केंद्र ने पिछली सुनवाई के उस सुझाव पर विचार करने के बाद यह रिपोर्ट दी, जिसमें जस्टिस वराले ने वांगचुक की खराब दिख रही हालत के कारण हिरासत पर पुनर्विचार करने को कहा था। सरकार ने अपनी समीक्षा के बाद साफ कर दिया कि मेडिकल ग्राउंड पर रिहाई की कोई संभावना नहीं है क्योंकि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं।
NSA के तहत 12 महीने की हिरासत और कानूनी पेच
यह पूरा मामला लद्दाख को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के समर्थन में हुए हिंसक प्रदर्शनों से जुड़ा है। सोनम वांगचुक की हिरासत 26 सितंबर, 2025 को की गई थी और वर्तमान में वे राजस्थान के जोधपुर जेल में बंद हैं। उन पर कड़ा नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA), 1980 लगाया गया है।
इस कानून के तहत प्रशासन को यह अधिकार मिलता है कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना किसी औपचारिक आरोप या ट्रायल के 12 महीने तक प्रिवेंटिव डिटेंशन में रख सकता है। वांगचुक की पत्नी ने इसी हिरासत को “गैर-कानूनी” बताते हुए हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की है, जिस पर अब न्यायिक जांच चल रही है।
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पर्यावरण की आड़ में पब्लिक ऑर्डर बिगाड़ने का आरोप
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट के सामने यह आरोप भी लगाया कि वांगचुक का व्यवहार पूरी तरह गांधीवादी नहीं है। सरकार का दावा है कि एक्टिविस्ट ने पर्यावरण संबंधी चिंताओं की आड़ में एक अनशन आयोजित किया था, जिसका वास्तविक उद्देश्य पब्लिक ऑर्डर (जन व्यवस्था) में व्यवधान डालना था।
केंद्र ने तर्क दिया कि किसी एक खास वाक्य के आधार पर उन्हें अहिंसक नहीं माना जा सकता, बल्कि उनके समग्र कृत्यों को देखना होगा। फिलहाल, कोर्ट ने केंद्र से सभी तथ्यों को समग्र रूप से पेश करने को कहा है और उम्मीद है कि सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली इस याचिका पर कल भी सुनवाई जारी रहेगी।
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